me, in office

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दिसम्बर 4, 2012 · 2:17 अपराह्न

परिंदगी

उजास

भर गया वो

अपनी सरपट

उड़ान से

अनंत आकाश में…

कभी सर्पिल

कभी ऊपर-नीचे

तो कभी,

पंखों को समेटे

बन्दूक की गोली-सा…

टिटहरी की

चीख,

तो पपीहे

की मीठी बोली-सा

उसकी उड़ान

मंजिलों का

आह्वान थी,

वह पंखों की

सरसराहट से ही

चूजों को

किलकित कर देता…

उनकी कच्ची-सी

चोंच में

चुग्गा भर देता…

बस, डराती

उसे नीरवता !

गुम होते

प्रेम नद की

पगडण्डी के

ऊपर-ऊपर

डग भरता,

चक्करघिन्नी-सा …

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