उजास
भर गया वो
अपनी सरपट
उड़ान से
अनंत आकाश में…
कभी सर्पिल
कभी ऊपर-नीचे
तो कभी,
पंखों को समेटे
बन्दूक की गोली-सा…
टिटहरी की
चीख,
तो पपीहे
की मीठी बोली-सा
उसकी उड़ान
मंजिलों का
आह्वान थी,
वह पंखों की
सरसराहट से ही
चूजों को
किलकित कर देता…
उनकी कच्ची-सी
चोंच में
चुग्गा भर देता…
बस, डराती
उसे नीरवता !
गुम होते
प्रेम नद की
पगडण्डी के
ऊपर-ऊपर
डग भरता,
चक्करघिन्नी-सा …